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सीता नवमी: एक आत्मचिंतन, एक दर्पण — मेरी जन्म तिथि:

हरिओम 🙏

आज सीता नवमी की पावन तिथि है…

और तिथि के अनुसार, यह मेरा जन्मदिवस भी है।


Jyotish Shastra का अध्ययन करते हुए एक बात गहराई से समझ में आती है—

कि हर तिथि केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं होती,

बल्कि एक विशेष ऊर्जा, एक विशेष भाव और संदेश को लेकर आती है।


जीवन को थोड़ा ध्यान से देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि

कुछ अनुभव बार-बार हमें कुछ सिखाते हैं और सत्य की ओर ले जाते हैं।


कभी परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि व्यक्ति को अकेले रहना पड़ता है।

बाहर से देखने पर यह केवल “अकेले रहना” ही दिखता है,

परंतु वास्तव में वह केवल शरीर के स्तर पर ही होता है।

शरीर के स्तर पर जो दिखता है, वह पूरी सच्चाई नहीं होती।


Bhagavad Gita में कहा गया है:


“इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥” (अध्याय ३, श्लोक ४२)


अर्थ: इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, और बुद्धि मन से भी श्रेष्ठ है।


यह हमें एक बहुत गहरी बात समझाता है—

कि बाहरी स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण है—भीतर मन में क्या चल रहा है।

---

एक आंतरिक परिवर्तन:


एक ही परिस्थिति—अकेले रहना—

दो बिल्कुल अलग अनुभव दे सकती है।


यदि मन में अशांति, दुःख या खालीपन है,

तो वही अवस्था अकेलापन (Loneliness) बन जाती है।


लेकिन यदि मन शांत हो, संतुष्ट हो,

और जीवन में कुछ देने का भाव हो—

सेवा का भाव हो—

तो वही अवस्था एकांत (Solitude) में बदल जाती है।


पिछले कई वर्षों में एकांत का अनुभव मिला—

और उसी ने बहुत कुछ सिखाया।

पहले अकेलेपन की अनुभूति होती थी,

पर भगवान की कृपा से वही अनुभव धीरे-धीरे एकांत में रूपांतरित हो गया।


अब यह स्पष्ट अनुभव है कि—

परिवर्तन बाहर नहीं, बल्कि मन के स्तर पर होता है।

और जब मन का रूपांतरण होता है,

तो जीवन का अनुभव भी पूरी तरह बदल जाता है।

---

मन का महत्व:


इसीलिए मन को इतना महत्व दिया गया है।


Jyotish Shastra में चन्द्र को मन का प्रतीक माना गया है।

चन्द्र राशि हमारे मानसिक भावों को दर्शाती है—

और भीतर की स्थिति ही हमारे अनुभव को आकार देती है।

---

मन: मित्र या शत्रु:


Bhagavad Gita में एक और गहरी बात कही गई है:


“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥” (अध्याय ६, श्लोक ५)


अर्थ: मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी।


जब मन बुद्धि की सुनने लगता है,

तो वही मन हमारा सहायक बन जाता है।

---

एक गहरी अनुभूति:


माता सीता का जीवन जितना महान है,

उतना ही एक और सत्य भी धीरे-धीरे सामने आता है—


आज भी, सीता नवमी पर बहुत अधिक उत्सव या स्मरण नहीं होता।

साल भर भी उनका स्मरण बहुत कम दिखाई देता है।

माता सीता—जो स्वयं माता लक्ष्मी का स्वरूप हैं,

जिनका जीवन इतनी महान साधना से भरा है—

और फिर भी समय के साथ एक शांत विस्मरण।


यह एक सूक्ष्म सीख देता है कि इस विशाल सृष्टि में हम सभी कितने छोटे हैं…

और फिर भी मन अक्सर स्वयं के अनुभवों, भावनाओं और पहचान में ही उलझा रहता है।


हम स्वयं को ही केंद्र मान लेते हैं—

जबकि सत्य इससे कहीं अधिक विशाल है।

---

वर्तमान का सत्य:


और यहीं से एक और गहरी समझ जन्म लेती है—


कि जीवन का सार “याद रखे जाने” में नहीं,

बल्कि “जीते हुए हर क्षण में जागरूक रहने” में है।


जब ध्यान (Meditation) और जागरूकता (Mindfulness/Awareness) की बात की जाती है,

तो उसका मूल भी यही है—


यहीं होना… अभी होना… पूरी तरह से होना।

जागरूकता में रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है—

Being in awareness is all that truly matters.

---

एक संकेत:


माता सीता के पिता, राजा जनक—

जिनसे Ashtavakra Gita जैसे ज्ञान का प्रवाह हुआ—

यह संकेत देता है कि जीवन की हर परिस्थिति,

आत्मबोध का एक द्वार बन सकती है।

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अंत में…


अब यह केवल एक विचार नहीं,

बल्कि एक स्पष्ट अनुभव है—


कि जीवन में जो भी आता है,

वह व्यर्थ नहीं आता।


अकेलापन भी आता है…

पर जब मन का रूपांतरण होता है,

तो वही एकांत बन जाता है।


और शायद इस रूपांतरण को समझना ही जीवन की सबसे बड़ी सीख है…


और शायद यही सबसे बड़ी साधना है—

बाहर की परिस्थितियों को बदलना नहीं,

बल्कि भीतर के अनुभव को बदलना।


---

जो कुछ भी है, वही साधना है…

और जो हो रहा है, वही पूर्ण है।



– मंजुश्री राठी

 
 
 

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